22nd July 2018 50

तीन साल बाद मूलस्थान पर विराजी मां तारा


108 पुरोहित, हजारों भक्तों के बीच हुआ 16 शृंगार

हिमांचल/ शिमला। महिषासुर मर्दनी मां तारा आखिर तीन वर्ष के अंतराल के बाद अपने मूल स्थान में विराजमान हो गई हैं। 108 पुरोहितों और हजारों भक्तों की उपस्थिति में मां ने शुक्रवार को सुबह करीब 9 बजकर 45 मिनट पर नवनिर्मित भवन में प्रवेश किया। इसके बाद मां तारा के 16 शृंगार किया गया। 

माता के साथ इस बार काली और सरस्वती माता की मूर्तियां भी मंदिर में स्थापित की गई हैं। माता के मुख्य यजमान के रूप में जुन्गा रियासत के राजा वीर विक्रम सेन पूजा अर्चना में बैठे। इसके अलावा पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह, उनकी धर्मपत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे विक्रमादित्य सिंह भी माता के दर्शनों के लिए पहुंचे।

शिमला से 13 किलोमीटर दूर तारा पर्वत पर बने इस मंदिर का बौद्ध धर्म के लोगों के लिए भी हिंदुओं की देवी मां तारा का काफी महत्व है। तारा मां को देवी दुर्गा की नौ बहनों में से नौवीं बहन कहा गया है। मंदिर का इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना है। इसकी स्थापना पश्चिम बंगाल के सेन वंश के एक राजा ने करवाई थी। शरद नवरात्र में अष्टमी के दिन मां तारा की पूजा की जाती है।

पुरानी शैली से हुए मंदिर के निर्माण पर चार करोड़ रुपये खर्च किया गया है। मंदिर निर्माण में पूरी तरह लकड़ी का प्रयोग किया गया। मंदिर में दुर्लभ नक्काशी के लिए खास कारीगर बुलाए गए थे। मंदिर के अंदर छतों और दीवारों की लकड़ी पर विशेष नक्काशी की गई है। मंदिर के भीतर लोगों को माता की परिक्रमा करने के लिए भी विशेष प्रबंध किया गया। नए मंदिर में एक समय में कई लोगों के बैठने की व्यवस्था की गई है।



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