28th September 2018 6

महिलाओं को मंदिर में जाने से नहीं रोक सकते : सुप्रीम कोर्ट


केरल के सबरीमाला मंदिर में उच्चतम न्यायालय ने दी महिलाओं के प्रवेश की अनुमति
संविधान पीठ ने 800 साल पुरानी परंपरा को दिया असंवैधानिक करार
नयी दिल्ली। आज सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने साफ  कहा है कि हर उम्र वर्ग की महिलाएं अब मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारी संस्कृति में महिला का स्थान आदरणीय है। यहां महिलाओं को देवी की तरह पूजा जाता है और मंदिर में प्रवेश से रोका जा रहा है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि धर्म के नाम पर पुरुषवादी सोच ठीक नहीं है। उम्र के आधार पर मंदिर में प्रवेश से रोकना धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है। आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला 4 1 के बहुमत से आया है।
बता दें कि केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर लगी रोक अब खत्म हो गई है। आज सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। पांच जजों की बेंच ने 4 1 अनुपात के हिसाब से महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 800 साल पुराने मंदिर की इस परंपरा को खत्म कर दिया है। इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति नहीं थी। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस नरीमन, जस्टिस खानविलकर ने महिलाओं के पक्ष में एक मत से फैसला सुनाया, जबकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने सबरीमाला मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया।
फैसला पढ़ते हुए चीफ  जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि आस्था के नाम पर लिंगभेद नहीं किया जा सकता है। कानून और समाज का काम सभी को बराबरी से देखने का है। महिलाओं के लिए दोहरा मापदंड उनके सम्मान को कम करता है। चीफ जस्टिस ने कहा कि भगवान अयप्पा के भक्तों को अलग अलग धर्मों में नहीं बांट सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 25 के मुताबिक सभी बराबर हैं। समाज में बदलाव दिखना जरूरी है, व्यक्तित्व गरिमा अलग चीज है। पहले महिलाओं पर पाबंदी उनको कमजोर मानकर लगाई गई थी।
जस्टिस नरीमन ने अपना फैसला पढ़ते हुए कहा कि महिलाओं को किसी भी स्तर से कमतर आंकना संविधान का उल्लंघन करना ही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सबरीमाला मंदिर की ओर से याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि वह इस पर रिव्यू पेटिशेन दायर करेंगे।
जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने इस मामले पर सबरीमाला मंदिर के पक्ष में अपना फैसला पढ़ते हुए कहा कि धार्मिक आस्थाओं को आर्टिकल 14 के आधार पर नहीं मापा जा सकता है। जस्टिस मल्होत्रा ने कहा कि आस्था से जुड़े मामले को समाज को ही तय करना चाहिए ना की कोर्ट को। उन्होंने कहा कि सबरीमाला श्राइन के पास आर्टिकल 25 के तहत अधिकार है, इसलिए कोर्ट इन मामलों में दखल नहीं दे सकता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक  मान्यताएं भी बुनियादी अधिकारों का ही हिस्सा है।
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आठ दिनों तक सुनवाई करने के उपरांत एक अगस्त को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। न्यायमूर्ति मिश्रा, न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदू मल्होत्रा की पीठ ने पहले कहा था कि महिलाओं को प्रवेश से अलग रखने पर रोक लगाने वाले संवैधानिक प्रावधान का 'उज्ज्वल लोकतंत्रÓ में कुछ मूल्य है।
क्यों लगाई थी रोक?
केरल के पत्थनमथिट्टा जिले के पश्चिमी घाट की पहाड़ी पर स्थित सबरीमाला मंदिर प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 10 से 50 वर्ष की आयु तक की महिलाओं के प्रवेश पर इसलिए प्रतिबंध लगाया गया है क्योंकि मासिक धर्म के समय वे शुद्धता बनाए नहीं रख सकतीं।
महिलाओं के पक्ष में थी केरल सरकार!
इस मामले में 7 नवंबर 2016 को केरल सरकार ने कोर्ट को सूचित किया था कि वह ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है। शुरुआत में राज्य की तत्कालीन एलडीएफ सरकार ने 2007 में प्रगतिशील रूख अपनाते हुए मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की हिमायत की थी जिसे कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार ने बदल दिया था।
यूडीएफ सरकार का कहना था कि वह 10 से 50 आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित करने के पक्ष में है क्योंकि यह परपंरा अति प्राचीन काल से चली आ रही है। बाद में केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए एक बार फिर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सहमति जताई। राज्य सरकार का कहना था कि सरकार हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश के समर्थन में है।
तब राज्य सरकार के इस स्टैंड पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने सवाल उठाते हुए कहा था कि आपने चौथी बार स्टैंड बदला। जस्टिस रोहिंगटन ने कहा कि केरल वक्त के साथ बदल रहा है। 2015 में केरल सरकार ने महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया था, लेकिन 2017 में उसने अपना रुख बदल दिया था। जिसके बाद अब फिर उसने प्रवेश देने पर सहमति जताई।


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