14th January 2017 86

उत्तराखंड की जनता के आगे दिग्गज हुए बेबस


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रुद्रपुर/हल्द्वानी। लोकतंत्र में जनता की ताकत को कोई नकार नहीं सकता। जनता चाहे तो किसी को भी फर्श से अर्श तक पहुंचा सकती है। अगर जनता का मिजाज बिगड़ गया तो वह अर्श पर पहुंचे दिग्गजों को भी पटक कर जमीन पर ला देती है। उाराखंड राज्य बनने के बाद कई दिग्गजों की हार इस बात को साबित करती है कि जनता की ताकत के आगे वे कुछ भी नहीं हैं। यही वजह है कि इस विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी फूंककर फूंककर कदम रख रहे हैं। बताते चलें कि 9 नवंबर 2000 में पृथक राज्य उाराखंड बनने के बाद मुयमंत्री नित्यानंद स्वामी के नेतृत्व में भाजपा की अंतरिम सरकार बनी थी। वर्ष 2002 में राज्य में पहले आम विधानसभा चुनाव हुए। इस विधानसभा में राज्य के पहले मुयमंत्री नित्यानंद स्वामी लक्ष्मण स्वामी चौक विधानसभा सीट से चुनाव लड़े और हार गए। स्वामी का लगभग एक वर्ष का कार्यकाल विवादित न होने, भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने न आने के बावजूद जनता ने मिलनसार स्वामी को चुनाव में नकार दिया। सियासी दिग्गज माने जाने वाले रमेश पोखरियाल निशंक व केदार सिंह फोनिया को जनता ने धूल चटा दी थी। इस चुनाव में एनडी तिवारी के नेतृत्व में सरकार बनी। इसके बाद 2007 में सूबे में दूसरे विधानसभा चुनाव हुए। इसमें पूर्व मुयमंत्री नित्यानंद स्वामी फिर से लक्ष्मण चौक से चुनाव तो लड़े लेकिन जनता ने उन्हें फिर नकार दिया, वहीं तिवारी सरकार में नंबर वन और टू मंत्री रहे डॉ. इंदिरा हृदयेश और नवप्रभात भी 2007 में चुनाव हार गए। जबकि इन दोनों ने अपने क्षेत्रों में विकास के नए आयाम स्थापित किए थे। लेकिन जनता ने इन्हें फिर भी पसंद नहीं किया। इनके अलावा मंत्री हीरा सिंह बिष्ट और शूरवीर सिंह सजवाण भी चुनाव हार गए। राज्य के तीसरे विधानसभा चुनाव वर्ष 2012 में तो और भी दिलचस्प घटनाएं हुई। ईमानदार छवि रखने वाले भुवन चंद्र खडूंरी तक इस चुनाव को हार गए। खंडूरी ने कोटद्वार से चुनाव लड़ा था। मात्र एक सीट ज्यादा मिलने से कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका मिल गया था। तब भाजपा को 31 व कांग्रेस को 32 सीटें मिली थी। इस चुनाव में भाजपा सरकार के मंत्री रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत, मातवर सिंह कंडारी व प्रकाश पंत को भी हार का मुंह देखना पड़ा। जबकि इन्हें जीत की पूरी उमीद थी। लेकिन जनता ने अलग ही फैसला सुना दिया। अन्य दिग्गजों में किशोर उपाध्याय, टीपीएस रावत, तिलकराज बेहड़ को भी निराशा हाथ लगी और वे भी हार गए। उदाहरणों से साफ है कि जनता ने काम करने वाले और इमानदार चेहरों को भी नकार दिया।


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