25th April 2016 55

नौ बागी विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के मामले में आज सुनवाई


नैनीताल। कांग्रेस के नौ बागी विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के मामले में न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की एकलपीठ के समक्ष आज सुनवाई चल रही है।  इस दौरान कोर्ट ने स्पीकर के अधिवक्ता से पूछा कि क्या विनियोग विधेयक पारित हुआ था। इस मामले में आज ही फैसला आने की संभावना है।

कोर्ट ने स्पीकर के अधिवक्ता से यह भी जानना चाहा कि क्या स्पीकर ने फैसले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन किया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के यदुरप्पा केस के बारे में राय मांगी। 

बागियों की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता सीए सुंदरम ने कहा कि स्पीकर ने दल बदल कानून की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर नौ विधायकों को अयोग्य घोषित किया। 28 मार्च को फ्लोर टेस्ट होना थाए लेकिन उन्हें सुनवाई का मौका नहीं दिया गया। उन्हें दस्तावेज मुहैय्या नहीं कराए गएए ताकि सरकार को बचाया जा  सके।


उन्होंने कहा कि फ्लोर टेस्ट से पहले सभी नौ विधायकों को अयोग्य घोषित करने केलिए नोटिस के जवाब में क्रास सवाल भी नहीं पूछने दिए गए। उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक के यदुरप्पा केस मामले में फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि बागी विधायकों की मत विभाजन की मांग उनका अधिकार व कर्तव्य था।

बागी विधायकों के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जब 35 विधायक बिल के विरोध में थेए तो ध्वनि मत से बिल कैसे पारित हो गया। उस समय सदन में 68 सदस्य थे। स्पीकर ने कानून और नियमों की मर्यादा तोड़ी। उन्होंने तर्क दिया कि यदि विधेयक ध्वनि मत से पारित हो गया तो फिर नौ विधायक बागी कैसे हो गए।

उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार का विरोध करते हुए मुख्यमंत्री बदलने की मांग की तो कानून कैसे तोड़ा। बागी विधायकों ने कांग्रेस की नीतियों का विरोध नहीं किया और न ही भाजपा को समर्थन दिया। फिर उन पर दलबदल कानून कैसे लागू हो सकता है। देश की आंतरिक लोकतंत्र की मजबूती को उनकी मांग जायज थी। अन्यथा किसी के खिलाफ आवाज उठाना अपराध हो जाएगा। इन विधायकों ने आज तक कोई दल नहीं बनायाए न ही किसी दल में शामिल हुए।


उन्होंने कहा कि भाजपा के 29 व कांग्रेस के नौ विधायकों ने संयुक्त ज्ञापन में मत विभाजन की मांग की थी। स्पीकर ने विनियोग विधेयक को गिरने के बाद भी ध्वनिमत से पारित बता दिया। लोकतंत्र में विरोध जायज है। नौ विधायकों ने कांग्रेसी के रूप में मत विभाजन मांगा। राज्यपाल से भी कांग्रेसी के रूप में ही मिलेए फिर दलबदल कैसे कहा जा सकता है।


बागी विधायकों के अधिवक्ता ने दलील दी कि मुख्यमंत्री बदलने की मांग और भ्रष्टाचार का विरोध करना मौलिक अधिकार है। कर्नाटक मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ ही उन्होंने गोवा के रवि नायकए पंजाब के जगजीत सिंह केस का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि दलबदल कानून का मतलब सरकार के लिए बहुमत का जुगाड़ करना नहीं है। संवैधानिक पद होने के बावजूद स्पीकर ने संसदीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाया।

उन्होंने कहा कि एक अच्छा कांग्रेसी होने के नाते गलत मुख्यमंत्री को बदलने की इसलिए मांग की गई कि सीएम की वजह से पार्टी की शाख खराब हो रही है। यदि इस तरह की मांग उठाने पर दलबदल कानून का प्रयाग किया गया तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।

बीती 23 अप्रैल को पूर्व केंद्रीय काननू मंत्री एवं वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि 18  मार्च को भाजपा ने कांग्रेस के नौ विधायकों की हॉर्स ट्रेडिंग की थी। सिब्बल की ओर से कोर्ट को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता इस मामले में ट्रांसफर अर्जी लगाकर हाई कोर्ट के निर्यण से बचना चाहते हैंए जबकि पूर्व में इस प्रकरण पर तिथि सुनवाई के लिए नियत है उसके बावजूद याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कोर्ट नहीं पहुंचेए इससे ही उनकी मंशा साफ दिखती है कि वह बचना चाहते हैं। स्पीकर की ओर से कहा गया कि इन बागी विधायकों ने अपने बयानों में कहा कि कांग्रेस की सदस्यता का त्याग नहीं किया है। सिब्बल ने कहा कि 18 मार्च की सुबह ही याचियों ने कह दिया था कि वे सरकार के खिलाफ वोट देंगे।



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