8th January 2017 58

नेताओं की अंदरूनी कलह ने रोकी विकास की रफ्तार


शिक्षा, स्वास्थ और रोजगार जैसे मुद्दों पर नहीं किया गौर

कार्तिक बिष्ट 9808990055

रामनगर। राज्य स्थापना के बाद से ही बड़े नेता की पसंद रही रामनगर विधानसभा उत्तराखंड की राजनीति को तय करने का माद्दा रखती है,  लेकिन क्षेत्रीय नेताओं की चापलूसी भरे रवैये और वरिष्ठ नेताओं की अंदरूनी कलह रामनगर को विकास की रफ्तार पकडऩे से रोकती रही है। 

घोषणाओं, शिलान्यासों और लाल बत्तियों का झांसा देकर लगातार भाजपा और काग्रेस दोनों ही दल रामनगर की जनता को ठगने का काम करते रहे हैं, लेकिन विकास का मुद्दा मात्र चुनावी भाषणों और सभाओं तक ही सिमटा हुआ नजर आता है। गौरतलब है कि रामनगर विश्व प्रसिद्ध कार्बेट पार्क होने के कारण पर्यटन क्षेत्र में काफी महत्व रखता है। प्रत्येक वर्ष करोड़ों का राजस्व राज्य के खजाने मे यहां से जमा होता है, बावजूद इसके हुक्मरान इसे उपेक्षा के चश्मे से ही देखते हैं। रामनगर के प्रति नेताओं के रवैये का आंकलन इसी से किया जा सकता है कि चार बार रोडवेज स्टेशन का शिलान्यास किया गया, लेकिन काम अभी तक शुरू नहीं हुआ। संयुक्त चिकित्सालय परिसर में स्थापित ब्लड बैंक में आज तक डाक्टर की नियुक्ति नहीं हो पायी है। बाढ़ सुरक्षा तटबंध का पेंच अभी तक फंसा हुआ है। कोसी से बाईपास पुल अभी तक अधूरा है। रामनगर डिग्री कालेज में छात्र संख्या के मुताबित शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो सकी।  वन गांवों तक अभी भी बिजली नहीं पहुंची है। कानिया गांव में प्रस्तावित मिनी स्टेडियम आज तक घोषणाओं में ही सिमटा है, लेकिन इन सबसे बेपरवाह राज्य सरकारों के नुमाइंदे क्षेत्र में अपने करीबियों को फायदा देने तक ही सीमित रह गए। रामनगर की उपेक्षा का अनुमान इसी से लग सकता है कि 2012 विधानसभा  चुनाव में कांग्रेस के पाले में सीट गई और कांग्रेस सरकार बनाने पर रामनगर विधायक अमृता रावत मंत्री बनने में भी सफल रहीं। साथ ही पालिका अध्यक्ष और ब्लाक प्रमुख भी कांग्रेस के ही बने, लेकिन अमृता पूरे कार्यकाल के दौरान क्षेत्र से गायब रहीं और कार्यकाल खत्म होने से कुछ महीने पहले दल बदल कर भाजपा मे शामिल हो गईं।  पालिका अध्यक्ष मोहम्मद  अकरम आगे की राजनीति का सफर तय करने लगे। तो वहीं ब्लाक प्रमुख  क्षेत्र की बजाय छात्र राजनीति और अपने को 2017 का विधायक प्रोजेक्ट करने की कवायद में लग गए। इसकी एक वजह रामनगर में कराए गए कांग्रेसी कार्यों में रणजीत सिंह रावत ने अपने आपको सबसे आगे दिखाया। किसी ने भी सरकार में करीबी लोग होने के बाद भी क्षेत्र के विकास की ओर नहीं देखा। इसी के साथ हाल ही में रणजीत सिंह रावत की रामनगर में बढ़ी सक्रियता से कांग्रेस धड़ों में भले ही बंट गई हो या यूँ कहे रावत ने कुछ कांग्रेसियों से खुद दूरी बनाकर रखी हो, परन्तु जनता ने सल्ट के विकास की तर्ज पर रामनगर में भी ऐसा ही विकास होगा सोचा। आचार संहिता लगने तक भी लोगो को उनसे बड़ी आशाएं बनी रहीं। वहीं मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक लंबे अरसे के बाद रामनगर  में चुनावी समर के आते ही रैली की। कई बार वो पहले या बाद में भी रामनगर आने से कतराते भी दिखे। इसके अलावा भाजपा नेता भी रामनगर को सरकार रहते कुछ नहीं दिला पाए। 

तो ऐसा रहा रामनगर का विकास 

नया राज्य बनने के पश्चात स्थानीय विधायक योगंबर सिंह रावत बने तो जनता में उत्साह था पर उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के लिए सीट छोड़ दी तो लोगों में आस बनी की मुख्यमंत्री यहां का होगा तो  शायद कुछ अलग हो परन्तु विकास लालबत्तियों का हुआ। जनता ने कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखाकर भाजपा के दीवान सिंह बिष्ट को विधायक चुना राज्य में भाजपा सरकार बनी पर स्थिति जस की तस रही। 2012 में जनता में नई सोच जागी और कांग्रेस से अमृता रावत विधायक के साथ साथ केबिनेट मंत्री चुनी गईं जनता ने उन्हें इसलिए भी मौका दिया की वे धनबल से परिपूर्ण और महिला शक्ति भी हैं। उन्होंने जनता को इसका परिणाम कांग्रेस से बगावत के रूप में दिया, जिससे विकास की गति खुद धीमी पड़ गई। 



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