7th January 2017 162

मकर संक्रांति तक न करें ये काम तो होगी यश और सफलता की प्राप्ति


सूर्य की धनु संक्रांति अर्थात सूर्य का धनु राशि में प्रवेश 15 दिसम्बर प्रात: 5 बजकर 3 मिनट पर हुआ है। धनु राशि का स्वामी बृहस्पति है। मुहूर्त चिंतामणि और सूर्य सिद्धांत शास्त्र के अनुसार जब जब सूर्य का बृहस्पति की राशियों क्रमश: धनु एवं मीन में प्रवेश होता है तब तब मल मास या खर मास कहलाता है। 

इस दृष्टि से बृहस्पति की राशियों में सूर्य का प्रवेश काल ही खर मास उत्पन्न करता है। वर्ष भर में 60 दिन यानी दो माह मल मास या खर मास के माने जाते हैं, जो अन्य राशि संचरणों के दृष्टि के आधार पर प्रकृति में विशेष महत्त्व रखते हैं।                                  

क्या है संक्रांति 

सूर्य का एक राशि को छोड़कर दूसरी राशि में गोचर या परिभ्रमण की अवस्था संक्रांति कहलाती है। इसका शाब्दिक अर्थ सूर्य के अन्य राशियों प्रवेश को लेकर भी माना जाता है। वर्ष भर में सूर्य की 12 संक्रांतियां आती हैं। एक माह में सूर्य की एक संक्रांति होती है इस आधार पर 12 राशियों के 12 मास पर सूर्य का संक्रांति का क्रम निर्भर करता है।                                   

मांगलिक कार्य निषिद्ध 

मुहूर्त चिन्तामणि व धर्म सिन्धु के अनुसार सूर्य का धनुर्मास या मल मास या खर मास में मांगलिक कार्य जैसे विवाह यज्ञोपवित (उपनयन) संस्कार, चौलकर्म (मुंडन) संस्कार, गृह प्रवेश, गृह आरम्भ, दैव प्रतिष्ठा सहित उग्र व सौम्य दैव प्राण प्रतिष्ठा वर्जित माने गए हैं यानी इस एक माह में कोई भी शुभ कार्य नहीं किए जा सकते हैं। 

सोलह घटी का पुण्य काल 

सामान्यत: सूर्य संक्रांति के समय से आगे और पीछे की सोलह सोलह घटी तक पुण्य काल होता है यदि संक्रांति अर्द्धरात्रि से पहले हो, तो पहले दिन के पिछले दो प्रहर 'पुण्यकाल होते हैं। यदि संक्रांति अर्द्धरात्रि के उपरांत हो तो दूसरे दिन का पूर्व भाग पुण्यकाल होता है। अगर ठीक अर्द्धरात्रि की संक्रांति हो तो दोनों दिन पुण्यकाल होता है।

पराक्रम के लिए करें साधना

अवसाद से मुक्ति तथा उन्नति की प्राप्ति के लिए साधना की पुष्टता का है धनुर्मास। धनुर्मास में सूर्य की आराधना का उल्लेख दैवी भागवत, तैतरीय आरण्यक, पद्म पुराण लिंग पुराण, मार्कण्डेय पुराण सहित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद में प्राप्त होता है। 

प्रकट दैव के रूप में उपस्थित संसार को प्रकाशित करने वाले सूर्य नारायण भगवान एकमात्र देवता है जो दृष्ट भी है और अनुभूत भी। पंच महाभूतों में या पंचतत्त्वों में इनकी प्रकृति वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी स्पष्ट दिखाई देती है। 

इनकी साधना व उपासना करने पर बल, बुद्धि, तेज, पराक्रम आत्मोन्नति नेत्रज्योति, उच्चपद, दिव्यज्ञान, आध्यात्म, वंशवृद्धि, सांसारिक सुख प्रदान करते हैं।


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