29th March 2018 156

पढिय़े.. कहां है वह गांव जहां 93 सालों से नहीं हुआ मानव और वन्य जीवों में संघर्ष


93 सालों से कॉर्बेट विलेज में नहीं हुआ एक भी मानव वन्य जीव संघर्ष

जानवर और इंसानों के बीच सामंजस्य की मिसाल बना कॉर्बेट विलेज

गांव के 185 परिवार जानवरों की हर हरकत को बारीकीसे समझते हैं


जीवन राज, हल्द्वानी

जंगल में इंसानों के बढ़ते दखल से जहां जंगल संकट में हैं वहीं वन्य जीवों की आबादी में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इन सबके बीच मानव वन्य जीवों के बीच संघर्ष के आंकड़े भी लगातार बढ़ रहे हैं। जिसमें इंसानों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है, लेकिन इन सबके बीच एक अच्छी खबर भी है। खबर यह है कि जंगल के बीच बसे एक गांव में पिछले 93 सालों में एक भी मानव वन्य जीव संघर्ष की घटना सामने नहीं आई है और इसकी सबसे बड़ी वजह है इन गांव वासियों का जंगल और जंगली जानवरों के प्रति समर्पण। जो इन्हें कभी आमने सामने नहीं होने देता। इस गांव को कॉर्बेट विलेज के नाम से जाना जाता है। जिसे छोटी हल्द्वानी भी कहते हैं।

बता दें कि छोटी हल्द्वानी जिसे कॉर्बेट विलेज के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 1915 में जिम कॉर्बेट ने 221 एकड़ जमीन गुमान सिंह बरवा से खरीदी, जिस पर उन्होंने छोटी हल्द्वानी को बसाया। ग्रामीणों के मुताबिक जंगल घना होने की वजह से जंगली जानवर उनकी फसलों को तबाह कर देते थे। ग्रामीणों की इस मुसीबत को देखते हुए जिम कॉर्बेट ने सन 1925 में गांव के चारों ओर पांच किलोमीटर की दीवार का निर्माण कराया। जानकार बताते हैं कि उस समय मूलभूत सुविधाओं के अभाव में पांच किमी. की इस दीवार को बनने में करीब 10 साल का समय लगा था। यह दीवार आज भी मरम्मत के अभाव में गांव के चारों तरफ  मौजूद है। यही नहीं जिम कॉर्बेट ग्रामीणों के साथ जिस चौपाल में वार्तालाप करते वो चौपाल भी इस गांव में अभी भी है। इस गांव में करीब 185 परिवार निवास करते हैं। गांव चारों ओर से जंगल से सटा हुआ है, लेकिन ग्रामीण आज भी बेखौफ होकर अपनी जिंदगी जी रहे हैं। ग्रामीणों ने गांव में कॉर्बेट विकास समिति बनाई है, जो आने वाले पर्यटकों को कॉर्बेट विलेज का भ्रमण कराती है और जिम कॉर्बेट से संबंधित जानकारियां भी उपलब्ध कराती हैं। ग्रामीणों के मुताबिक इस इलाके को पर्यटन से जोडऩा उनकी प्राथमिकता है। जिससे यहां जल, जंगल, जमीन भी बच सकें और स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल सकें।

 कॉर्बेट विलेज के स्थानीय गाइड एम सी पांडेय बताते है कि लगातार बढ़ रहे मानव वन्य जीव संघर्षों के बीच इससे अच्छी खबर और क्या हो सकती है कि सन 1925 से लेकर अब तक इस गांव में जंगली जानवरों ने किसी भी तरह की घटना को अंजाम नहीं दिया। स्थानीय लोग बताते हैं कि जिम कॉर्बेट ने अपनी किताबों में इस बात का जिक्रकिया कि इस इलाके के लोगों का वाइल्ड लाइफ  से बेहद लगाव है। ग्रामीण जंगली जानवरों की मूवमेंट को बहुत अच्छी तरह समझते है, जिससे दोनों तरफ  सामंजस्य बना रहता है। ऐसा नहीं है कि यहां बाघ, गुलदार जैसे जानवर नहीं आते, बल्कि रोज आते है, लेकिन ग्रामीणों की जंगल और जमीन की समझ और वन्य जीवों के प्रति उनके लगाव ने मानव वन्य जीव संघर्ष को रोके रखा है।  

इस उपलब्धि का श्रेय ग्रामीणों को 

करीब पिछले 93 सालों में वन्य जीव मानव संघर्ष की कोई घटना ना होना एक बड़ी उपलब्धि है। इसका सीधा श्रेय उन ग्रामीणों को जाता हैं। जिन्होंने वन्य जीवों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा है, क्योंकि उन ग्रामीणों के जेहन में जिम कॉर्बेट के प्रति सोच आज भी जिंदा है। 

 पराग मधुकर धकाते

वन सरंक्षक, पश्चिमी वृत्त, हल्द्वानी


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