22nd March 2018 98

विरासत बनकर रह गई भारत की पहली आयरन भट्टी


ब्रिटिश शासनकाल में डेविड एंड कंपनी ने कालाढूंगी में कराया था निर्माण

लजिम कार्बेट की किताब 'माई इंडिया  में भी है कारखाने का जिक्र

जीवन राज, हल्द्वानी

ब्रिटिश शासन के दौरान विकास के लिहाज से जो काम किये गए, वो आज  हमारे देश के लिए केवल विरासत बनकर रह गयी है।  इन्ही विरासतों में से एक है उत्तर भारत की प्रथम आइरन भट्टी जो कालाढूंगी में हुआ करती थी। लेकिन आज यह आयरन भट्टी केवल विरासत बनकर रह गईं है। 

बता दें कि कालाढूंगी में 1858 में डेविड एंड कंपनी द्वारा उत्तर भारत की सबसे पहली लौह भट्टी स्थापित की गई। यहां लौह भट्टी स्थापित करने का मकसद लौह भट्टी के लिए कच्चा माल आस पास की पहाडिय़ों और जंगलों में उपलब्ध था। लौह भट्टी के यहां स्थापित होने से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला और अच्छा व्यवसाय भी, लेकिन पर्यावरणीय प्रभाव को देखते हुए सन 1876 में सर हेनरी रैमसे द्वारा पेड़ों के कटान पर रोक लगने के बाद इसे बंद कर दिया गया। दरअसल इस लौह भट्टी का इतिहास कालाढूंगी कस्बे से भी जुड़ा है। जिन बड़े बड़े काले पत्थरों को लौह अयस्क के लिए भट्टी में प्रयोग किया जाता था। उसे कुमांउनी भाषा में (काला ढूंग) अर्थात काला पत्थर कहा जाता है। जिससे इस कस्बे का नाम कालाढूंगी पड़ गया। इस लौह भट्टी की चार सरंचना अभी भी यहां बनी हुई है, जो बदहाल और खस्ताहाल पड़ी हुई है।  स्थानीय लोगों के मुताबिक भट्टी के आस पास के खेतों में जुताई के दौरान लोहे के अवशेष अभी भी मिलते रहते है। 

जिम कार्बेट ने किताब (माई इंडिया) में इस लोहे के कारखाने का जिक्र करते हुए लिखा है कि इस भट्टी से जंगलों का विनाश होने की आशंका से इस कारखाने को बंद कर दिया गया। स्थानीय लोगों के मुताबिक आज लौह भट्टी के अवशेष बदहाल हालत में पड़े हुए हैं जिसकी सुध लेने की जरूरत कभी भी सरकार ने नहीं समझी। अगर सरकार इस लौह भट्टी को संरक्षित करने के प्रयास करती तो यहां पर्यटन को नया आयाम मिलता क्योंकि लौह भट्टी को देखने पर्यटक यहां आते रहते हैं। उत्तराखंड के इतिहास में यह कोई पहला मामला नहीं है। जब कोई महत्वपूर्ण चीज़ बदहाल हालत में पड़ी हो, जानकारों की माने तो सरकार को बदहाल पड़ी इस लौह भट्टी को संरक्षित करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाना चाहिए जिससे इस क्षेत्र को एक नई पहचान और पर्यटन को बढ़ावा मिल सकें। फिलहाल यह देखने वाली बात है कि कब तक सरकार इस बदहाल पड़ी लौह भट्टी को संरक्षित करती है।

कुमांऊ में हैं पांच आयरन भट्टी

इतिहासकार प्रो.  हीरा सिंह भाकुनी  बताते हैं कि पूरे कुमांऊ में पांच आयरन भट्टी हैं। जिसमें एक (देचोरी) कोटाबाग, खुर्पाताल, कालाढूंगी, रामगढ़, (ऊलना) पिथौरागढ़ में स्थापित की गई थी। उनके मुताबिक अंग्रेजों के आने से पहले भी आयरन के स्रोत थे, जबकि अंग्रेजी शासकों ने इसकी तकनीक को अपडेट किया था।  


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