17th May 2017 121

क्या महिलाएं तीन तलाक मानने से कर सकती है इनकार : एससी


मुस्लिमों में सिर्फ 0.37 प्रतिशत लोग ही देते हैं तीन तलाक को प्राथमिकता : सिब्बल

नई दिल्ली। तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया खेहर ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अधिवक्ता कपिल सिब्बल से पूछा है कि क्या ट्रिपल तलाक की स्थिति में मुस्लिम महिलाओं के पास ये अधिकार है कि वो ट्रिपल तलाक को स्वीकार न करें?

बतादें कि तीन तलाक के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में आज याचिकाकर्ताओं और भारत सरकार का पक्ष सुनने के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) का पक्ष सुना गया। कोर्ट ने बुधवार को पूछा कि क्या एक औरत शादी के समझौते में तीन तलाक को स्वीकार करने से मना कर सकती है? सीजेआई जेएस खेहर ने आज एआईएमपीएलबी के वकील कपिल सिब्बल से पूछा कि क्या काजी निकाहनाम तैयार करते वक्त शादी के कॉन्ट्रैक्ट में पत्नी को तीन तलाक से इनकार करने का विकल्प देता है? इस पर सिब्बल ने कहा कि यह बहुत अच्छी सलाह और बोर्ड इस पर जरूर ध्यान देगा। साथ ही सिब्बल ने कोर्ट में एक सर्वे भी दिखाया जिसके अनुसार मुस्लिमों में सिर्फ 0.37 प्रतिशत लोग ही तीन तलाक को प्राथमिकता देते हैं।

कोर्ट को बताया कि बोर्ड की एडवाईजरी को सभी काजी मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। उन्होंने ये भी कहा कि बोर्ड सभी सुझावों को नम्रता पूर्वक स्वीकार करता है और वो इस बात पर गौर करेगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से 14 अप्रैल 2017 को पास किया गया रिजॉल्यूशन भी दिखाया गया जिसमें कहा गया कि ट्रिपल तलाक पाप है और इसको कहने वाले लोगों का समुदाय को बहिष्कार करना चाहिए।

पर्सनल लॉ बोर्ड ने चीफ जस्टिस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय बेंच को बताया कि निकाह से पहले महिलाओं के पास चार विकल्प मौजूद हैं। इनमें विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत शादी दर्ज कराने का आग्रह भी शामिल है। अपनी गरिमा की रक्षा के लिए महिलाओं को भी सभी सूरतों में तीन तलाक कहने का अधिकार है। वहीं पति द्वारा तलाक देने की स्थिति में मेहर की ऊंची रकम की भी मांग कर सकती हैं।


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