1st July 2018 212

पहाड़ से पलायन की पीड़ा लेकर आ रहे आगरी


5 जुलाई को रिलीज होगा पलायन पर आधारित गीत कति गेई उ दिन आज

ढोल दमाऊ ग्रुप से भी उत्तराखंड की संस्कृति को संवार रहे आगरी

जीवन राज, हल्द्वानी।

इन दिनों उत्तराखंडी संगीत अपने चरम पर है। नये नये प्रयोगों के साथ कई नये कलाकार उभरकर आ रहे हैं। इसी श्रेणी में एक कलाकार शामिल है जगदीश आगरी। पहाड़ में जन्मे जगदीश आगरी इन दिनों ग्रेटर नोएडा में उत्तराखंड की संस्कृति को संवारने में लगे हुए है। आगरी ने उत्तराखंड के वाद्य यंत्रों को संवारने के साथ साथ संगीत को भी आगे बढ़ाने का जिम्मा अपने कंधों पर लिया है। पिछले महीने उनकी एलबम गैलो हुणदेश (बाबा भैरानाथ जागर) के बाद अब आगामी 5 जुलाई को उनकी कति गेई उ दिन आज गीत लांच हो रहा है। जिसका उत्तराखंड की संगीत प्रेमियों को बेसब्री से इंतजार हैं।

वसुन्धरा दीप से खास बातचीत में जगदीश आगरी ने बताया कि पहाड़ में बढ़ते पलायन को लेकर उन्होंने यह गीत लिखा है। पहाड़ और पलायन दो ऐसे शब्द है जो आज हर उत्तराखंडी को पीड़ा पहुंचाती है। इन्हीं शब्दों को गीत के माध्यम से वह जन जन तक पहुंचाना चाहते है। आगरी ने बताया कि इस गीत में पहाड़ के खाली होते गांव, खेतों में ऊगाई जाने वाली फसलों के साथ भट्ट के डुबके, सिसुण की सब्जी, गडेरी, पिनालू और चौमास के दिनों में उगने वाला ल्यूण का जिक्र किया गया है। जो पहाड़ों में काफी प्रसिद्ध है। इसके अलावा गांव व मिस्त्री जो अपनी कलाकृति से मकानों की सुंदरता को बढ़ाता था वो अब गांव में नहीं दिखता है। इन सभी को शब्दों को पिरोकर सुंदर वर्णन किया है। 

यह गीत यूके म्यूजिक के बैनर तले रिलीज होगा। इस गीत में म्यूजिक दिया है मोती शाह ने, विशेष सहयोग श्रवण भारद्वाज और मार्गदर्शन सुमित मनराल ने किया है। आगरी ने इस गीत के माध्यम से पहाड़ की पीड़ा को उजागर किया है। कुमाऊंनी गीतों के अलावा आगरी ढोल दमाऊ ग्रुप के साथ दिल्ली में पहाड़ की संस्कृति को संवारने में जुटे है। दिल्ली में रह रहे उत्तराखंडी लोगों में उनके ढोल दमाऊ ग्रुप की मांग बढ़ी है। 



Visitors: 303440
© 2018 Vasundhara Deep News. All rights reserved.