27th May 2018 72

समाज सुधारक ही नहीं, समाज उत्थान के प्रबल स्तंभ थे महर्षि देव दयानंद


रुद्रपुर। व्यक्तियों को कभी भी अब प्रशस्त निंदनीय कर्म नहीं करने चाहिए क्योंकि उपरोक्त कर्म लोक व परलोक दोनों में अशांत कर देते हैं सुख व शांति अपने व समस्त आदरणीय का आदर सम्मान करने अर्थार्थ शुभ कर्म कर्म पर ही प्राप्त होते हैं।

यह विचार मेरठ से पधारे वेदों के प्रकांड विद्वान आचार्य डा. वेद पाल ने उपदेशामृत पान कराते हुए कहे। आचार्य प्रतिनिधि उत्तर प्रदेश के महामंत्री पूज्य स्वामी धर्मेश्वर नंद सरस्वती ने कहा कि महर्षि देव दयानंद महाराज केवल समाज सुधारक ही नहीं वरन समाज उत्थान के प्रबल स्तंभ थे। दयानंद ने समाज के पतन को देखकर आर्य समाज की स्थापना इसलिए कि कि भारत के गौरव को पुन: स्थापित किया जा सके ऋषि दयानंद ने समाज में फैले हुए अनेक तथाकथित मजहबों की आड़ में धर्म की सत्य स्वरूप को विकृत करके जिन लोगों ने अपने स्वार्थ पूर्ति का साधन बना दिया था। ऐसे स्वार्थी तत्वों को सन्मार्ग पर लाकर खड़ा किया। बिजनौर से पधारे पंडित कुलदीप आर्य ने सु मधुर भजनों के माध्यम से प्रभु भक्ति का उपदेश दिया। आज के जजमान डा. राजवीर सिंह नेहरा, सुधीर ग्रोवर, कपिल कटारिया व अशोक  रहे।


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