7th July 2018 217

पहाड़ों ठण्डो पाणि, कि भलि मीठी बाणी...


गुम हुए उत्तराखंड की पहली लोक गायका के सुर

70 80 के दशक में नजीबाबाद और लखनऊ आकाशवाणी से सुनाई देते थे गीत

जीवन राज, हल्द्वानी।

70 80 के दशक में नजीबाबाद और लखनऊ आकाशवाणी से सुनाई देने वाले कुमांऊनी गीतों के सुर अब हमेशा के लिए गुम हो गये है। कबूतरी देवी का पहाड़ो ठंडो पाणि, कि भलि मीठी बाणी छोडऩी नी लागनी गीत आज पहाड़ की याद दिलाता है। लोग उन्हें तीजनबाई के नाम से भी जानते थे। उनके निधन पर उत्तराखंड के संगीत जगत को एक बड़ी हानि हुई है। जिसे कभी भरा नहीं जा सकता। 

गौरतलब है कि कबूतरी देवी उस दौर की गायकी थी जब रेडियो में गीत प्रसारित होते थे। शाम को पहाड़ों में रेडियों पर लोग उनके गानों का आनंद लिया करते थे। बताया जाता है कि कबूतरी देवी के पति उन्हेंं गायकी के लिए कई आकाशवाणी केन्द्रों में ले गए। कबूतरी देवी का संबंध पहाड़ की उस गायकी से है जिसे मूल कला कहा जाता है। आज कबूतरी देवी को कई गीतकार अपना आदर्श मानते है। उनका उत्तराखंड के लोक गीत एवं संगीत में अमूल्य योगदान रहा। कबूतरी देवी उत्तराखंड की पहली लोक गायिका मानी जाती है। 

बताया जाता है कि उस समय आकाशवाणी से एक गीत की रिकॉर्डिंग के उन्हें 25 50 रूपये मिलते थे। इसके बावजूद भी उन्होंने अपनी लोक गायकी जारी रखी। अपने कई संघर्षों के बावजूद उन्होंने उत्तरांखड की लोक गायकी को आगे बढ़ाया। पति की मृत्यु की बाद उन्होंने आकाशवाणी के लिये और समारोहों के लिये गाना बन्द कर दिया था। उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। उनकी गायकी की प्रतिभा के लिए उन्हें 2002 में सम्मानित किया गया और उत्तराखंड संस्कृति विभाग ने उन्हें पेंशन देने का फैसला किया।


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