पाकिस्तान: खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल, आतंकियों को पालने की नीति पड़ी भारी
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में 11 अक्टूबर को आपातकाल और गवर्नर शासन लागू किए जाने के बाद राजनीतिक और सुरक्षा हालात पर सवाल उठने लगे हैं। इस कदम से इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के नेतृत्व वाला प्रांतीय प्रशासन प्रभावी रूप से निलंबित हो गया और प्रांत के 12 जिलों में संघीय नियंत्रण बढ़ गया। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं।
पाकिस्तान की सुरक्षा नीति लंबे समय से विवादों में रही है। आलोचकों का आरोप है कि देश ने रणनीतिक हितों के लिए दशकों तक कुछ आतंकी संगठनों को समर्थन दिया या उनके प्रति नरम रुख अपनाया। लेकिन अलग-अलग संगठनों के बीच पसंद और नापसंद के आधार पर अपनाई गई नीति ने हिंसा को बढ़ावा दिया, जिसका असर अब पाकिस्तान के भीतर भी दिखाई दे रहा है। खैबर पख्तूनख्वा जैसे सीमावर्ती और आदिवासी इलाकों के नागरिक लंबे समय से उग्रवाद और संघर्ष का सामना कर रहे हैं।
आपातकाल लागू होने से पाकिस्तान में लोकतंत्र, प्रांतीय स्वायत्तता और सेना की बढ़ती भूमिका को लेकर भी बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों और आलोचकों का कहना है कि संघीय हस्तक्षेप से चुनी हुई सरकार कमजोर हुई है और सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ा है। ऐसे में पाकिस्तान के सामने सुरक्षा संकट से निपटने के साथ-साथ अपनी पुरानी नीतियों के परिणामों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती से जुड़े सवालों का जवाब देने की चुनौती भी है।





