फिल्म ‘सूर्या अंत से आरंभ तक’ पर भड़का काशीपुर आईएमए, प्रदर्शन रोकने की मांग

फिल्म ‘सूर्या अंत से आरंभ तक’ पर भड़का काशीपुर आईएमए, प्रदर्शन रोकने की मांग

 

काशीपुर। शीघ्र रिलीज होने जा रही हिंदी फिल्म ‘सूर्या अंत से आरंभ तक’ को लेकर शनिवार को यहां इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) की काशीपुर शाखा के पदाधिकारियों ने गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए इसके प्रदर्शन पर रोक लगाए जाने की मांग उठाई। रामनगर रोड स्थित आईएमए कार्यालय (कल्याम्) में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर चिकित्सकों ने अपनी पीड़ा व्यक्त की। आईएमए काशीपुर के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अरविंद शर्मा ने कहा कि चिकित्सा पेशेवर इस फिल्म ‘सूर्या अंत से आरंभ तक’ को लेकर बहुत परेशान और नाराज हैं।‌ इस फिल्म में चिकित्सा पेशेवरों को खलनायक के रूप में दिखाया गया है और यह फिल्म चिकित्सा जगत के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देती है। आईएमए काशीपुर के सदस्य इस फिल्म की कड़ी निंदा करते हैं। साथ ही भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव से आग्रह करते हैं कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें और चिकित्सा पेशेवरों तथा मरीजों के हित में इस फिल्म को तुरंत रुकवाएं। उन्होंने कहा कि “कोई भी शिकायत स्वास्थ्य की देखभाल करने वालों के विरुद्ध हिंसा को उचित नहीं ठहरा सकती।” फिल्म ‘सूर्या – अंत से आरंभ तक’ की प्रचार सामग्री को लेकर हाल ही में उठी चिंताएँ गंभीरता से विचार किए जाने योग्य हैं। डॉ. अरविंद शर्मा ने कहा कि हम रचनात्मक स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं और मानते हैं कि सिनेमा में कठिन प्रश्न उठाने की क्षमता होती है। सिनेमा को संस्थाओं पर सवाल उठाने, गलत कार्यों को उजागर करने और कठिन कहानियाँ प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता है। यह स्वतंत्रता महत्त्वपूर्ण है। लेकिन हम स्वास्थ्य सेवा से जुड़े पेशेवरों को किस प्रकार प्रस्तुत करते हैं, यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्रभावी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जनता का विश्वास आवश्यक है। स्वास्थ्य सेवा से जुड़े पेशेवरों का दायित्व है कि वे नैतिक मूल्यों का पालन करें। समाज को गलत कार्यों पर ईमानदार चर्चा के साथ-साथ उन लोगों का निष्पक्ष चित्रण भी देखने को मिलना चाहिए, जो अपना जीवन मरीजों की सेवा में समर्पित कर देते हैं।

भ्रष्टाचार और अनैतिक कार्यों को कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए और न ही उनका बचाव किया जाना चाहिए। जहाँ भी गलत कार्य होते हैं, वहाँ निष्पक्ष जाँच, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। हालाँकि, कुछ लोगों के गलत कार्यों के कारण पूरे चिकित्सा पेशे को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े अधिकांश कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में अथक परिश्रम करते हैं और मरीजों की जान बचाने के लिए अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को निष्पक्ष जाँच, पेशेवर सम्मान और सुरक्षित कार्यस्थल का अधिकार मिलना चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि फिल्मों में दिखाए जाने वाले दृश्यों से स्वास्थ्यकर्मियों के विरुद्ध हिंसा को कभी भी सामान्य या उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए। शिकायतों और समस्याओं को हमेशा कानूनी तथा रचनात्मक माध्यमों से उठाया जाना चाहिए। एक चिकित्सा समुदाय के रूप में हम नैतिक चिकित्सा सेवा, संस्थागत पारदर्शिता और मरीजों के कल्याण के प्रति प्रतिबद्ध हैं। हम फिल्म निर्माताओं और समाज से आग्रह करते हैं कि वे ऐसी कहानियों को अपनाएँ जो साहसी होने के साथ-साथ जिम्मेदार भी हों। ऐसी कहानियाँ प्रस्तुत की जानी चाहिए जो जनता के विश्वास को मजबूत करें, न कि उन लोगों की सुरक्षा को कमजोर करें जो दूसरों का उपचार करके उनकी जान बचाते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अध्यक्ष डॉ. पीके दीक्षित, सचिव डॉ. तरुण सोलंकी, डॉ. अरविंद शर्मा, डॉ. पारुल सिंघल, डॉ. केके अग्रवाल, डॉ. पुनीत बंसल, डॉ. मनोज कुशवाहा व डॉ. राहुल सिंघल आदि उपस्थित थे।

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