## पीओके में अशांति की खबरों पर पाकिस्तान की सख्ती, कई वेबसाइट्स और यूट्यूब चैनलों पर लगाया प्रतिबंध

## पीओके में अशांति की खबरों पर पाकिस्तान की सख्ती, कई वेबसाइट्स और यूट्यूब चैनलों पर लगाया प्रतिबंध

इस्लामाबाद।** पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) में जारी विरोध-प्रदर्शनों और राजनीतिक अशांति की खबरों को लेकर पाकिस्तान ने डिजिटल सेंसरशिप और कड़ी कर दी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पीओके की स्थिति को कवर करने वाली कई स्थानीय और क्षेत्रीय समाचार वेबसाइट्स, अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स और यूट्यूब चैनलों तक पहुंच सीमित कर दी गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन प्लेटफॉर्म्स पर कार्रवाई की गई है, वे पीओके में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों, कथित सुरक्षा अभियानों और स्थानीय लोगों के बढ़ते असंतोष से जुड़ी खबरें प्रकाशित कर रहे थे। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन प्रतिबंधों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

### विपक्षी नेताओं और पत्रकारों से जुड़े चैनल भी निशाने पर

24 जून के एक अदालती आदेश के आधार पर पाकिस्तान की मुख्य विपक्षी पार्टी, उसके नेताओं और जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान से जुड़े कई डिजिटल चैनलों के साथ सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के प्लेटफॉर्म्स पर भी कार्रवाई की जा सकती है।

इससे पहले जुलाई में मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया था कि पाकिस्तान की नेशनल साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NCCIA) की रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने कई यूट्यूब चैनलों को ब्लॉक करने का आदेश दिया था। बताया गया कि करीब 27 कंटेंट क्रिएटर्स को भी नोटिस भेजे गए, जिनमें कोर्ट के निर्देशों का पालन न करने पर चैनल ब्लॉक किए जाने की चेतावनी दी गई।

### अभिव्यक्ति की आजादी पर उठे सवाल

डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इन कदमों पर चिंता जताते हुए कहा है कि इससे पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सीमित हो सकती है। उनका कहना है कि टीवी और प्रिंट मीडिया पर पहले से मौजूद प्रतिबंधों के बीच सोशल मीडिया ही सार्वजनिक बहस और असहमति व्यक्त करने का प्रमुख मंच बचा है।

### चुनावी प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

पीओके में चुनाव के दूसरे चरण के दौरान कई इलाकों में विरोध-प्रदर्शन, सड़क जाम और लॉजिस्टिक समस्याओं के कारण मतदान प्रक्रिया प्रभावित हुई। रिपोर्ट्स के अनुसार, 21 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान के दौरान कई मतदान केंद्रों तक पहुंच बाधित रही, जिससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर नए सवाल खड़े हुए।

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